देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाने की दिशा में सरकार की रणनीति स्पष्ट हो गई है। ‘द वीक’ द्वारा आयोजित हेल्थकेयर एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री ने कहा कि मेडिकल डिवाइस के क्षेत्र में आयात पर निर्भरता केवल एक आर्थिक कमजोरी नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम है। कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधान ने यह सबक दिया कि एक सशक्त और आत्मनिर्भर स्वास्थ्य प्रणाली के लिए घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना अनिवार्य है।
‘द वीक’ की पहल की सराहना
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री ने सबसे पहले ‘द वीक’ पत्रिका द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि दुबई में विश्व सरकार शिखर सम्मेलन की यात्रा के दौरान उन्होंने पत्रिका का एक विशेष स्वास्थ्य पूरक (हेल्थ सप्लीमेंट) पढ़ा, जो एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) जैसे गंभीर विषय पर केंद्रित था। उन्होंने कहा कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बढ़ती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। ऐसे मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के लिए ‘द वीक’ द्वारा स्वास्थ्य विषयक एक विशेष वेबसाइट विकसित करना और विशेष पूरक प्रकाशित करना देश के लिए एक बड़ी सेवा है।
मेडिकल डिवाइस: एक रणनीतिक प्राथमिकता
मंत्री ने कहा कि भारत की जनसंख्या और स्वास्थ्य प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे गतिशील प्रणालियों में से एक है। बावजूद इसके, पिछले कई वर्षों तक उच्च स्तरीय मेडिकल डिवाइस का एक बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर था। उन्होंने स्पष्ट किया, “इस आयात निर्भरता का असर सीधे मरीजों की लागत पर पड़ता है। ये उपकरण महंगे होते हैं, जिससे मरीजों का आउट-ऑफ-पॉकेट (ओओपी) खर्च बढ़ता है। हमारी सरकार का एक प्रमुख लक्ष्य इसी खर्च को कम करना है।”
उन्होंने बताया कि कोविड-19 महामारी के बाद सरकार ने वर्ष 2023 में राष्ट्रीय मेडिकल डिवाइस नीति लागू की। यह नीति एक टर्निंग पॉइंट साबित हुई क्योंकि इसमें केवल आयात प्रतिस्थापन (इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूशन) पर ही नहीं, बल्कि नवाचार-आधारित विनिर्माण (इनोवेशन-लेड मैन्युफैक्चरिंग) को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
पीएलआई योजना से मिली सफलता
नीति को मूर्त रूप देने के लिए सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना शुरू की, जो विशेष रूप से उच्च स्तरीय मेडिकल डिवाइस के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए थी। मंत्री ने इस योजना की सफलता के आंकड़े साझा करते हुए बताया कि आज देश में 24 से अधिक ग्रीनफील्ड परियोजनाएं शुरू हो चुकी हैं।
सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि जिन 57 उत्पादों के लिए भारत पहले पूरी तरह से आयात पर निर्भर था, उनका उत्पादन आज भारत में ही हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो दशकों में यह क्षेत्र आयात पर निर्भर बाजार से बदलकर अब एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण केंद्र बनने की ओर अग्रसर है, जहां निर्यात लगातार बढ़ रहा है।
इकोसिस्टम को मजबूत करने की पहल
मंत्री ने कहा कि केवल उत्पादन ही काफी नहीं है, बल्कि एक एकीकृत आपूर्ति पारिस्थितिकी तंत्र (सप्लाई इकोसिस्टम) का विकास भी उतना ही जरूरी है। इसी कड़ी में सरकार ने मेडिकल डिवाइस पार्क स्थापित करने की योजना को मंजूरी दी। उन्होंने बताया कि तीन राज्यों—उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु—में इन पार्कों की स्थापना को स्वीकृति दी गई है। ये पार्क वर्तमान में मौजूद आपूर्ति श्रृंखला में व्याप्त खंडित ढांचे (फ्रैग्मेंटेशन) को कम करेंगे और साझा बुनियादी ढांचे (शेयर्ड इंफ्रास्ट्रक्चर) के माध्यम से विनिर्माण को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएंगे।
इसके अलावा, वर्ष 2024 के अंत में मेडिकल डिवाइस उद्योग को सशक्त बनाने की एक नई योजना शुरू की गई। मंत्री ने विस्तार से बताया कि इस योजना के तहत उद्योग के हर महत्वपूर्ण पहलू को शामिल किया गया है—जैसे कि प्रमुख घटकों और कच्चे माल का विकास, कौशल विकास और क्षमता निर्माण, क्लिनिकल स्टडीज में सहायता, सामान्य सुविधाओं का विकास, और ब्रांडिंग एवं प्रचार।
स्टार्टअप्स के लिए ‘मेटेक मित्र’
स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च) ने स्टार्टअप्स और नवप्रवर्तकों (इनोवेटर्स) पर विशेष ध्यान देते हुए ‘मेटेक मित्र’ योजना शुरू की है। मंत्री ने बताया कि इस योजना का उद्देश्य नए उद्यमियों को नियामकीय ढांचे को समझने और उसमें नेविगेट करने में मदद करना, क्लिनिकल स्टडीज के लिए सहायता प्रदान करना और अंततः उनके उत्पादों को बाजार में सफलतापूर्वक लॉन्च करने में सहूलियत प्रदान करना है। उन्होंने कहा कि यह योजना काफी अच्छा काम कर रही है और नए स्टार्टअप्स को मजबूत समर्थन दे रही है।
भविष्य की रूपरेखा: 2047 का लक्ष्य
मंत्री ने कहा कि सरकार की इन योजनाओं ने क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव लाया है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि “यह केवल शुरुआत है।” उन्होंने बताया कि आने वाले समय में सरकार का फोकस निम्नलिखित बिंदुओं पर रहेगा:
- डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन को गहरा करना: केवल असेंबलिंग नहीं, बल्कि घटक स्तर पर मूल्य वर्धन बढ़ाना।
- इनोवेशन-लेड मैन्युफैक्चरिंग: अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) को प्रोत्साहित करना।
- एमएसएमई की भागीदारी: प्रमुख घटकों के विकास में लघु एवं मध्यम उद्योगों की भूमिका मजबूत करना।
- डिजिटल सप्लाई चेन: डिजिटल उपकरणों के माध्यम से आपूर्ति श्रृंखला को अधिक पारदर्शी और कुशल बनाना।
- निर्यात विस्तार: वैश्विक बाजारों में भारतीय मेडिकल डिवाइस की उपस्थिति बढ़ाना।
- गुणवत्ता मानक: वैश्विक बेंचमार्क के अनुरूप उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
अपने संबोधन के समापन में मंत्री ने सभी हितधारकों—नीति निर्माताओं, उद्योग जगत, निर्यातकों, शिक्षाविदों और निवेशकों—से सहयोग की अपील की। उन्होंने कहा, “भारत के पास स्केल (क्षमता), इंटेंट (इच्छाशक्ति), सही नीतिगत माहौल और उद्यमशीलता की भावना है। इन चारों तत्वों के साथ हम न केवल उच्च स्तरीय मेडिकल डिवाइस में आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि दुनिया के लिए एक भरोसेमंद वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में भी उभर सकते हैं।”
उन्होंने ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को सामने रखते हुए कहा कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर स्वास्थ्य प्रणाली इस दिशा में आधारशिला का काम करेगी। कार्यक्रम के दौरान मंत्री ने आयोजकों को धन्यवाद देते हुए विश्वास जताया कि इस संक्लेव से जो सुझाव (की टेकअवे) निकलकर आएंगे, वे स्वास्थ्य क्षेत्र के भविष्य को नई दिशा देने में सहायक होंगे।


